‘सप्ताह के कवि’ श्रृंखला में मौसम कुमारी की एक कविता “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, एक झूठा सच”…

■□■ व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी, एक झूठा सच : मौसम कुमारी

यह सच नहीं है, फिर भी सबसे ज़्यादा सच्चा लगता है।
यह झूठ है, फिर भी सबसे ज़्यादा यकीन किया जाता है।
यह एक मैसेज है जो कभी मरता नहीं, बस घूमता रहता है – फोन से फोन, दिल से दिल, पीढ़ी से पीढ़ी।

हम सब इसके छात्र हैं।
हमने कभी फॉर्म नहीं भरा, कभी फीस नहीं दी, फिर भी यहाँ रजिस्ट्रेशन अपने आप हो जाता है।
बस एक बार किसी ने आपको किसी ग्रुप में जोड़ा, और आपका नामांकन हो गया – आजीवन।

यहाँ पाठ्यक्रम रोज़ बदलता है।
सुबह नौ बजे का सच शाम छह बजे तक झूठ हो जाता है।
शाम छह बजे का सच रात दस बजे तक मिथक बन जाता है।
फिर भी हम उसे “आँखें खोल देने वाला सच” कहकर फॉरवर्ड करते हैं।
क्योंकि यहाँ सच की कोई परीक्षा नहीं होती,
बस फॉरवर्ड की गिनती होती है।

यहाँ प्रोफेसर कोई नहीं, हम सब प्रोफेसर हैं।
हम सब कुलपति हैं।
हम सब चपरासी भी हैं जो दरवाज़ा खोलते हैं झूठ के लिए।
हम ही लिखते हैं, हम ही पढ़ते हैं, हम ही विश्वास करते हैं, हम ही मारते हैं।

हमने देखा है
एक दाढ़ी वाले बेगुनाह को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला क्योंकि किसी ने लिख दिया था “ये बच्चा चोर है”।
हमने देखा है
किसी माँ ने अपने बच्चे को वैक्सीन नहीं लगवाई क्योंकि ग्रुप में आया था “ये चिप लगती है”।
हमने देखा है
किसी का घर जल गया क्योंकि किसी ने पुराना वीडियो नया बताकर भेज दिया।
हमने देखा है और फिर भी फॉरवर्ड किया।

यह झूठा सच इतना ताकतवर है कि
असली सच उसके सामने काँपने लगता है।
वैज्ञानिक तथ्य यहाँ हार जाते हैं।
अखबार की सुर्खियाँ यहाँ फीकी पड़ जाती हैं।
कानून यहाँ कुछ नहीं कर पाता।
क्योंकि यहाँ कानून नहीं, भावना का राज है।

फिर भी हम इसे छोड़ नहीं पाते।
क्योंकि इसी झूठे सच के बीच में कभी-कभी सच भी आ जाता है –
माँ की तबीयत की खबर,
बहन की शादी की तारीख,
किसी अपने के जाने की सूचना।
हम झूठ के महासागर में इसलिए डूबे रहते हैं
क्योंकि उसमें दो बूंद सच की भी तैर रही होती हैं।

यह झूठा सच अब हमारी साँस बन गया है।
हम इसे साँस की तरह फॉरवर्ड करते हैं।
हम इसे साँस की तरह जीते हैं।
हम इसे साँस की तरह मारते भी हैं।

बस एक बार रुकिए।
अगला मैसेज आने पर दस सेकंड के लिए रुकिए।
उस दस सेकंड में पूछिए –
यह सच है या सिर्फ़ सच लग रहा है?
यह ज़रूरी है या सिर्फ़ डरावना है?

शायद दस सेकंड में हम समझ जाएँ
कि सच और झूठ के बीच का फर्क
बस एक उंगली का फासला है –
फॉरवर्ड बटन और डिलीट बटन के बीच।

— 25 नवंबर 2025 (कवयित्री मौसम कुमारी बी.ए. (इतिहास), एक साधारण गृहणी और फुर्सत में कलम चलाती हैं। कविता रचनाकर्म की यात्रा आशीष कुमार सिंह के संग शुरू करती हैं और अपने पति आशीष के साथ साथ चलने के लिए कविता लिखती हैं उनके साथ होने के लिए लिखती हैं।mausam.singh261986@gmail.com (छवि साभार गूगल)

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