‘अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस‘ पर अपनी कविता “वह पुरुष पूर्ण तब होता है,”..के द्वारा कवयित्री मंजुल त्रिवेदी मानती हैं कि ‘पूर्ण पुरुष की परिभाषा आज भी संभव’ है! पूर्ण पुरुष आज भी संभव है ! ‘सप्ताह के कवि‘ श्रृंखला में कवयित्री मंजुल त्रिवेदी की कविता “वह पुरुष पूर्ण तब होता है,” …।
■□ वह पुरुष पूर्ण तब होता है, …
वह पुरुष पूर्ण तब होता है,
जब ताक़त में नरमाई और नरमाई में ताक़त बसती है।
जब बाँसुरी-सी मधुर आवाज़ में
दुखों का मथुरापन और
धर्म का द्वारकापन दोनों एक साथ हँसती है।
वह पुरुष कृष्ण-सा तब बनता है,
जब राधा के आँसू भी उसके कंधे पर
तुलसी के पत्तों-से हल्के महसूस होते हैं
और दुनिया का बोझ
गोवर्धन सा उठाकर भी
चेहरा खिला रहता है।
वह पुरुष पूर्ण तब होता है,
जब प्रेम में समर्पण हो
और युद्ध में धर्म;
जब बाँसुरी व रणभूमि—
दोनों में उसका हृदय
एक ही ताल पर धड़कता हो।
कभी—
गोपियों के टूटे सपनों में मरहम सा,
कभी—
अर्जुन के डरे हुए मन का प्रकाश सा।
वह पुरुष वही है
जो किसी एक का नहीं,
सबका सहारा बनता है।
उसके प्रेम में नीति नहीं,
पर उसकी नीति में हमेशा प्रेम होता है।
वह जानता है—
राधा को पा लेना प्रेम नहीं,
राधा को समझ लेना ही
पुरुषत्व की सबसे बड़ी विजय है।
वह पुरुष कृष्ण जैसा तब लगता है,
जब किसी के रोते हुए स्वर में
अपनी ही आत्मा काँपती सुनाई दे।
जब वह
हँसता कम,
हँसाता ज़्यादा हो;
थकता ज़रूर हो,
पर किसी को थकने नहीं देता।
पुरुषत्व का सौन्दर्य
उसकी बाहों की शक्ति में नहीं,
उस अदृश्य ढाल में है
जो वह अपने प्रियजनों के लिए
हर पल ओढ़े रहता है।
सच कहूँ—
कृष्ण जैसा पुरुष बनना
सिर्फ़ जन्म नहीं,
दैनिक तपस्या है।
जहाँ प्रेम भी पूजा है
और ज़िम्मेदारी भी योग।
और अंत में—
वह पुरुष पूर्ण तभी होता है,
जब उसके हृदय में
राधा-सी पवित्रता,
अर्जुन-सी कर्तव्यनिष्ठा,
और
कृष्ण-सा अनंत करुणासागर बसता है।
–– मंजुल त्रिवेदी, (19 नवंबर 2025, अंतरराष्ट्रीय पुरुष दिवस) https://www.facebook.com/share/1AD3brbQau/

