बिहार में 2006 से ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद – तीनों स्तरों के चुनाव पूरी तरह निर्दलीय आधार पर हो रहे हैं। बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 और बिहार पंचायत चुनाव नियम 2006 ने राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्नों का इस्तेमाल साफ-साफ प्रतिबंधित कर दिया। शुरू में इसे “राजनीति मुक्त पंचायत” का बड़ा सुधार बताया गया था। उन्नीस साल बाद सचाई सामने है – यह एक असफल प्रयोग बन चुका है और पंचायती राज संस्थाएँ सचमुच अनाथ, बेबस और बेइज्जत हो गई हैं।
सबसे दयनीय हालत सरपंच की है
कानून सरपंच को ग्राम कचहरी का न्यायाधीश बनाता है। वह पाँच लाख तक के दीवानी और कुछ फौजदारी मामले निपटा सकता है। लेकिन बिहार के गाँवों में सरपंच का फैसला आज सिर्फ कागज का टुकड़ा है। पुलिस उसकी रिपोर्ट पर एफआईआर नहीं लिखती, अफसर फाइल दबाते हैं और दबंग लोग खुलेआम उसकी अवमानना करते हैं। कारण एक ही – वह निर्दलीय है, उसके पीछे कोई राजनीतिक ताकत नहीं। नतीजा, 8053 ग्राम कचहरियाँ नाम की हैं, काम लगभग शून्य।
योजना बनाने का अधिकार भी छिन गया
73वें संशोधन ने 29 विषय पंचायतों को दिए, पर बिहार में आज भी अधिकांश योजनाएँ पटना-दिल्ली से थोपी जाती हैं। जब चुने हुए प्रतिनिधि निर्दलीय होते हैं तो सरकार उन्हें “अपना” नहीं मानती और योजना बनाने का हक नहीं देती। नतीजा – भूजल संकट में तालाब गहरीकरण, बाढ़ क्षेत्र में छत उड़ने वाला आवास, शिक्षा-स्वास्थ्य की बदहाली में सोलर लाइट और डिजिटल ग्राम। ये योजनाएँ सफेद हाथी बनकर रह जाती हैं।
बाकी बीमारियाँ तो ज्यों की त्यों हैं
- सरकारी योजनाओं का पैसा विधायक-मंत्री कोटे से जाता है, मुखिया-प्रमुख सबसे पीछे।
- हर पाँच साल में 85-90 प्रतिशत पुराने प्रतिनिधि बदल जाते हैं, सारी योजनाएँ अधूरी।
- भ्रष्टाचार पर कोई दलगत कार्रवाई नहीं, दोषी व्यक्ति बच निकलता है।
- राजनीतिक संरक्षण न होने से पुलिस, प्रशासन और अफसर पंचायत प्रतिनिधियों को गंभीरता से नहीं लेते।
आधिकारिक आँकड़े भी यही कहते हैं
- 8053 ग्राम पंचायतें, 533 पंचायत समितियाँ, 38 जिला परिषदें
- पिछले चार चुनावों (2006, 2011, 2016, 2021) में सभी विजेता कानूनी तौर पर निर्दलीय
- केंद्र सरकार के 2024 पंचायत देवोल्यूशन इंडेक्स में बिहार मध्यम से नीचे
- ग्राम कचहरियों में केस लगभग न के बराबर
- अधिकांश ग्राम पंचायत विकास योजनाएँ (GPDP) ऊपर से थोपी गई टेम्प्लेट पर ही बनती हैं
एकमात्र इलाज – तीनों स्तरों पर दल-आधारित चुनाव
आधे-अधूरे सुधार से काम नहीं चलेगा। बिहार को अब सिर्फ एक ही बड़ा कदम उठाना है:
बिहार पंचायत राज अधिनियम 2006 में संशोधन करके
ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद – तीनों स्तरों पर राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न के साथ पूर्ण दल-आधारित चुनाव लागू करना।
जब पंचायत प्रतिनिधियों के पीछे राजनीतिक दल होगा, तभी
- सरपंच का फैसला लागू होगा, पुलिस उसकी रिपोर्ट पर तुरंत कार्रवाई करेगी
- सरकार पंचायतों को योजना बनाने का वास्तविक अधिकार देगी
- योजनाएँ गाँव की जरूरत के हिसाब से बनेंगी, सफेद हाथी नहीं
- राजनीतिक संरक्षण और जवाबदेही दोनों आएँगी
- भ्रष्टाचार पर दल को भी जवाब देना पड़ेगा
अंत में
निर्दलीय पंचायत चुनाव का प्रयोग बिहार के गाँवों पर थोपा गया एक क्रूर मजाक साबित हुआ है। इसने सरपंच को बेइज्जत, मुखिया को बेबस और पूरी पंचायती राज व्यवस्था को अनाथ बना दिया।
अब और इंतजार करने का समय नहीं है।
बिहार विधानसभा को अगले ही सत्र में कानून पास करके तीनों स्तरों पर दल-आधारित चुनाव बहाल करना होगा। जब तक पंचायतों के पीछे राजनीतिक दल का संरक्षण और जवाबदेही नहीं होगी, तब तक गाँवों की तकदीर नहीं बदलेगी।
पंचायती राज लोकतंत्र की जड़ है।
जड़ को अनाथ और बेइज्जत छोड़कर पेड़ को कभी हरा-भरा नहीं किया जा सकता।
अब समय है जड़ को उसका हक, इज्जत और ताकत लौटाने का।
