मुकेश बालयोगी E-mail: mukeshmasih@gmail.com (https://www.facebook.com/share/1BfyyMwM2H/) —
बिहार को भारत का उपनिवेश बनाकर रखने के खिलाफ संघर्ष का शंखनाद करने वाले समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा नहीं रहे।
ज्ञान और कर्म का द्वैत साधने वाले महान समाजवादी विचारक सच्चिदानंद सिन्हा नहीं रहे। 95 साल की लंबी आयु में लौकिक काया को छोड़कर वे अनंत चेतना में विलीन हो गए। पिछले 20 सालों में उनसे जब भी बात हुई, उसका विषय या तो पदार्थ और चेतना के अंतर्सबंध रहे या फिर स्पेस-टाइम(दिक् और काल की वक्रता)। उनके साथ घंटों लंबी बैठकी करने के बावजूद मैं प्रत्यक्षतः उनका शिष्य कभी नहीं रहा, बल्कि उनके साथ मेरे संबंध द्रोणाचार्य और एकलव्य जैसे रहे। मैं उनके ज्ञान की गंगा में अवगाहन कर आनंदित होता रहा और धीरे-धीरे अपनी वैचारिकी का निर्माण करता रहा। सच कहें तो अपने मन-मस्तिक को दार्शनिक अनुप्रयोगों की प्रयोगशाला बना देने के पीछे इस महापुरुष की अनंत जीवनी शक्ति काम करती रही।
जीवन के अंतिम क्षण तक मानवीय गरिमा पर केंद्रित नई दुनिया के निर्माण के संकल्प को जीते रहे सच्चिदानंद सिन्हा जी मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव मनिका में रहते थे। परंतु, दुनिया भर के समकालीन विचारकों से उनके पत्र-व्यवहार थे। अमेरिकी दार्शनिक जॉन जेर्जान (Running Emptiness के लेखक) ने अपने भारत दौरे में खास तौर पर सच्चिदानंद सिन्हा जी से मुलाकात की थी।
भारत द्वारा बिहार के शोषण के खिलाफ उठाई थी आवाज : बिहारी अस्मिता, बिहारी क्षेत्रवाद और बिहारी उपराष्ट्रवाद के सख्त विरोधी होते हुए भी सच्चिदानंद सिन्हा ने भारत द्वारा बिहार के शोषण के खिलाफ आवाज उठाई थी। अपनी पुस्तक The Internal Colony Of India में सुलगते सवालों से उन्होंने साबित कर दिया था कि बिहार को भारत ने अपना आतंरिक उपनिवेश बनाकर रखा है। बिहार को पिछड़ा बनाए रखने के लिए थोपी गई फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी के खिलाफ उन्होंने बौद्धिक संघर्ष छेड़ा। जो बाद में राजनीतिक मुहिम बना। आखिरकार भारत सरकार को फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी खत्म करनी पड़ी। तब तक बिहार पिछड़ेपन के गर्त में गिर चुका था।
अहिंसा पर इतनी श्रद्धा कि पूछ डाला- हे कृष्ण ‘गीता’ क्यों : किसी भी महान विचारक को अपनी विश्वदृष्टि (worldview) स्थापित करने के लिए तीन सवालों के जवाब देने पड़ते हैं। सृष्टि की उत्पति कैसे हुई? सृष्टि की अंतिम परिणति क्या है? इस उत्पत्ति से परिणति के बीच का मार्ग कौन सा है? इन प्रश्नों के उत्तर वैदिक मंत्रद्रष्टा ऋषियों से लेकर ईसा, मोहम्मद, बुद्ध और कार्ल मार्क्स तक को देने पड़े थे। एकबार मैंने उनकी विश्वदृष्टि जानने के लिए यही तीनों प्रश्न किए थे। उन्होंने टॉलेमी और अलबरूनी से लेकर न्यूटन और आइंस्टीन तक की विश्वदृष्टि की सारगर्भित व्याख्या करने के बाद समापन बांग्ला के महाकवि चंडीदास की पंक्तियों के साथ किया था-’सवाई ऊपरे मानुष तार, सत्य ऊपरे केऊ नाई’। उन्होंने कहा कि मानव जीवन का एकमात्र मिशन मानव को मानवीय गरिमा प्रदान करने का होना चाहिए। इसलिए ये सवाल अंतहीन और दिशाहीन हो जाते हैं। वे हंसते हुए कहते थे कि आज भी कम्युनिस्ट पार्टी की वैचारिक कक्षाओं में इस बात पर घंटों बहस चलती रहती है कि दुनिया में पहले मुर्गी आई या मुर्गी का अंडा आया। सच्चिदा जी की गांधी पर अगाध श्रद्धा थी। वे गांधी की विश्वदृष्टि के कायल थे। अहिंसा पर इतनी श्रद्धा कि सीधे भगवान कृष्ण से सवाल कर डाला कि हे कृष्ण आपने गीता का उपदेश क्यों दिया? अपनी पुस्तक ‘नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट’ में सच्चिदानंद जी कहते है कि हे कृष्ण, जब आप गीता में कह रहे हैं कि दुनिया माया है। हर ओर आप ही आप हैं। महाभारत के युद्ध में लड़ रहे लोग केवल भ्रम मात्र हैं। फिर भी आप धर्म की स्थापना के लिए हिंसा का उपदेश क्यों दे रहे हैं? जब सबकुछ आपकी माया से हो रहा है तो आप अहिंसा के माध्यम से भी धर्म की स्थापना करा सकते हैं। अपनी पुस्तक ‘नक्सली आंदोलन का वैचारिक संकट’ में सच्चिदा जी ने मार्क्स की विश्वदृष्टि की धज्जियां उड़ा दी। उन्होंने साफ कहा कि मार्क्स की विश्वदृष्टि हीगेल, डार्विन और न्यूटन के सिद्धांतों पर आधारित थी। आइंस्टीन के सापेक्षिकता के सिद्धांत ने दुनिया को देखने का नजरिया बदल दिया। मार्क्स ने अगर इसका अध्ययन किया होता तो वे भी बदल चुके होते। मार्क्स के कटु आलोचक होते हुए भी मार्क्सवादी लेखिका रोजा लक्जेमबर्ग के वे बड़े प्रशंसक थे। रोजा लक्जेमबर्ग की पुस्तक ‘Accumulation of Capital’ को दुनिया को समझने का महत्वपूर्ण नजरिया मानते थे।
‘अर्थकरी च विद्या’ नहीं ‘सा विद्या या विमुक्तये’ : मेरे मित्र हेमंत जी एकबार सच्चिदा जी से मिलने दुनिया की तमाम सुख-सुविधाओं से दूर उनकी झोपड़ी में गए। सच्चिदा जी ने पूछा कि आप अभी क्या कर रहे हैं? उन्होंने जवाब दिया कि एमबीए की पढ़ाई पूरी करने जा रहे हैं। मकसद पूछे जाने पर हेमंत जी ने इन्वेस्टमेंट बैंकर बनना बताया। अधिक गहराई में पूछने पर हेमंत जी ने शेयर मार्केट और कमोडिटी मार्केट से लेकर डिरेवेटिव्स और करेंसी तथा सिक्योरिटी और बांड तक का पूरा फाइनेंशियल वर्ल्ड समझा डाला। सच्चिदा जी ने मुस्कुराते हुए कहा- पैसा कमाने अथवा शेयर और निवेश का बड़ा खिलाड़ी बनने के लिए अधिक पढ़ने की क्या जरूरत है? भारत में शेयर मार्केट का सबसे बड़ा खिलाड़ी(धीरूभाई अंबानी) तो केवल नौवीं पास था। उन्होंने कहा कि ज्ञान अधिक हासिल करने का मकसद ‘सा विद्या या विमुक्तये’ ही होना चाहिए। यानी विद्या वही जो सभी बंधनों से मुक्त कर दे। हालांकि हमारे शास्त्रों ने ‘अर्थकरी च विद्या’ भी कहा है, यानी विद्या वही जो आर्थिक उपार्जन कराए। सच्चिदा जी इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि आर्थिक उपार्जन के लिए विद्या हासिल करते वक्त भी ध्येय वही होना चाहिए जो कबीर का जुलाहागिरी के प्रति और संत रविदास का जूते का मरम्मत करने के प्रति था। आज कोई इस बात की चर्चा नहीं करता कि कबीर कितना अच्छा कपड़ा बुनते थे और रविदास कितना अच्छा जूता सीते थे। फिर मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हैं- समझे मुकेश जी। मैं मर्म समझा चुका था। बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि पत्रकारिता सत्य के संधान का माध्यम है, इससे डिगिएगा नहीं। नौकरी की तरह मत लीजिगा। उनका संदेश पत्रकारों के लिए साफ था-’Truth Shall Make You Free ’।
सच्चिदा जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को एक आलेख में नहीं समेटा जा सकता है। यह श्रृंखला आगे कई दिनों तक जारी रहेगी।
