एस.के. सिंह एवं संजय कुमार –
बिहार विधानसभा में खाता भी नहीं खोल पाने वाली पूर्व चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने दावा किया कि उसके मतदाताओं का एक वर्ग “राष्ट्रीय जनता दल के नेतृत्व वाले जंगल राज की वापसी के डर से” भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के साथ चला गया। सच तो यह है कि राजनीति कोई व्यापार नहीं है और नेता सिर्फ़ राजनीतिक रणनीतिकार नहीं होते। प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जनसुराज पार्टी ने अच्छे एजेंडे और प्रयासों के साथ बिहार में बदलाव का सकारात्मक माहौल बनाया, लेकिन वे बुरी तरह विफल रहे, क्योंकि उन्होंने सेवानिवृत्त नौकरशाहों और उनकी चुनावी रणनीति पर अधिक से अधिक भरोसा किया। राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में देश- दुनिया में अपनी छवि बनाने वाले प्रशांत किशोर जो मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से सबसे अधिक लोकप्रिय रहे, जिन्होंने रिकॉर्ड तोड़ इंटरव्यू दिया, एक समय ऐसा लग रहा था कि वे विकल्प बन सकते हैं पर वे शून्य पर सिमट गए।
पीके हीं पार्टी, नेता, कार्यकर्ता और रणनीतिकार आदि सब कुछ थे जन सुराज में बाकी लोग या तो भाड़े के कार्यकर्ता हैं या बदलाव की इच्छा से प्रेरित कुछ लोगों का समूह। ऐसे हीं पूरा देश बिहार को राजनीतिक रूप से परिपक्व नहीं मानता। जरा सोचिए जिस पीके की चर्चा इतनी थी, किसी राजनीतिक पंडित ने इस तरह के परिणाम की बात नहीं कही थी वहाँ बिहार के मतदाताओं ने देश के लोकतांत्रिक इतिहास में एक कड़ी जोड़ी है जिस पर शोध करने की आवश्यकता है। यह भी मानना होगा कि पीके को एक भी सिट नहीं मिलना भी बिहार के लिए शुभ संकेत नहीं है।
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में एक बात साफ़ तौर पर उभर कर आई कि महिलाओं का वोट निर्णायक रहा और उन्होंने एनडीए को वोट दिया और जेडीयू को ज़्यादा वोट दिए। पिछले चुनावों की तुलना में जेडीयू की जीत दर से इसे समझा जा सकता है। भाजपा के राष्ट्रीय एजेंडे ने भी उसके वोट शेयर में योगदान दिया, खासकर ऑपरेशन सिंदूर के कारण जनता में बनी राय के बाद। इस चुनाव ने इस धारणा को भी तोड़ दिया कि यादव और मुस्लिम MY समुदाय केवल राजद को ही वोट देते हैं। सीमांचल और अन्य इलाकों में यह बात पूरी तरह साबित हो गई है।
बिहार विधान सभा के परिणाम से कई मिथक टूट गए , जिस नीतीश कुमार को चुनाव से पूर्व मानसिक रोग से पीड़ित, कुछ नौकरशाहों के गिरफ्त में, लोगों का विश्वास नहीं है और बिना विधान सभा जीते मुख्यमंत्री बने रहना तथा इस चुनाव के बाद इनका राजनीतिक भविष्य नहीं है आदि की चर्चा के बावजूद नीतीश कुमार अपने राजनीतिक करियर में सबसे अधिक और महत्वपूर्ण जीत हासिल की है। चुनाव परिणाम ने यह भी तय किया है कि केवल शिक्षित, दाग रहित और ईमानदार होना काफ़ी नहीं है बल्कि मतदाताओं ने इस बात का ध्यान अवश्य रखा है कि ऐसे लोग किस तरह के दल से चुनाव लड़ रहे हैं। भले ही कोई फिल्मी सितारा हो, नौकरशाह हो या शैक्षिक जगत का बड़ा नाम क्यों न हो, वोटर्स के लिए राजनीतिक मंच इस बार अधिक महत्त्वपूर्ण था।
यह आरोप कि महिलाओं को दस दस हज़ार रुपये दिए गये, शायद हम इससे सहमत नहीं हो सकते हैं पर क्या यह सही नहीं है कि महिलाएँ इस धन का सदुपयोग करेंगीं। पर इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि महिलाओं ने पीके को वोट इसलिए नहीं दिया क्योंकि उन्होंने घोषणा की थी कि जन सुराज की सरकार बनने के बाद वे शराब पर से प्रतिबंध हटा देंगें। यहीं बात अन्य दलों और गठबंधन पर भी लागू होती है। लालू के जंगल राज इस चुनाव में एक बड़ा मुद्दा था। महिलाओं का बड़े पैमाने पर एनडीए को वोट देने के पीछे यह बड़ा कारण था। जंगल राज तब तक मुद्दा रहेगा जब तक लालू का कुनबा आरजेडी नामक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी का नेतृत्व करेगा। एनडीए के प्रचंड बहुमत में एक बड़ी भूमिका उन मतदाताओं की रही जिन्होंने जात-पात, वर्ग, क्षेत्र और भाषा आदि से ऊपर उठकर राष्ट्र और धर्म के लिए वोट किया। बड़े पैमाने पर यादव समाज के युवाओं ने एनडीए को समर्थन दिया।
चुनाव से पहले तेजस्वी यादव के अहंकार और बयानों ने 90 के दशक के जंगलराज की याद दिला दी। रोहिणी आचार्य जिस ‘रमीज़’ का ज़िक्र अपने ट्वीट में कर रही हैं, वह कोई रणनीतिकार नहीं है ..! वह समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद और बलरामपुर के कुख्यात माफिया रिज़वान ज़हीर का दामाद है, जो हत्या, दंगा भड़काने और आपराधिक साज़िश जैसे मामलों में जेल में बंद है ..! बलरामपुर के पूर्व सांसद रिजवान जहीर के दामाद रमीज़ नेमत ख़ान कभी तेजस्वी यादव के साथ क्रिकेट खेलने के समय से ही परस्पर दोस्त के रूप में चिह्नित हुए थे! रमीज़ नेमत खुद उसी बलरामपुर जिले में तुलसीपुर नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष फिरोज पप्पू के गला रेत कर हत्या करने के केस में सह-आरोपी है! रिजवान जहीर सन् 1998 और 1999 में सपा से बलरामपुर लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी रहे हैं। सन् 2022 में बलरामपुर में तुलसीपुर नगर पंचायत के पूर्व अध्यक्ष फिरोज पप्पू के हत्याकांड का पुलिस नेे खुलासा किया था! इस हत्याकांड में पूर्व सांसद रिजवान ज़हीर और उनकी बेटी जेबा समेत छह लोगों को आरोपी बनाया गया था! यह पूरा परिवार ही स्थानीय ललितपुर केंद्रीय कारागार में सलाखों के पीछे है , मगर राजद ने उसे सलाहकार और चुनाव प्रबंधक बना दिया था!
रोहिणी आचार्य के ट्वीट के बाद रमीज ख़ान अपना फेसबुक प्रोफाइल लॉक कर लिया है! प्रसंगवश मदन शाह याद हैं ? उन्होंने तेजस्वी यादव को कोसते हुए कहा कि वह केवल 25 सीटें जीतेंगे और उन्होंने बिहार में ठीक 25 सीटें जीती हैं! शाह ने दावा किया था कि हरियाणवी संजय यादव लोगों को टिकट बेच रहे हैं, वे पार्टी के सदस्य भी नहीं हैं! बबूल रोंपा था, तो आम के फल कैसे फलेंगे ..?
कांग्रेस ने 61 सीटों पर चुनाव लड़कर बमुश्किल 10% का स्ट्राइक रेट हासिल किया, जो 2010 के बाद से उसका दूसरा सबसे खराब प्रदर्शन है, जब उसने केवल चार सीटें जीती थीं। राजद को करारा झटका लगा और उसने बिहार में अपनी हार को एक लंबे राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा बताया, हालाँकि उसकी सीटें घटकर 25 रह गईं। एनडीए को 2010 के बाद से यह अपनी सबसे बड़ी जीत मिली, जिसमें सभी सहयोगियों ने चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया। महिला मतदाताओं का बढ़ता महत्व हर आगामी विधानसभा चुनाव में और अधिक स्पष्ट होता जा रहा है। 2025 का बिहार चुनाव इस बात का एक उदाहरण बन सकता है कि कैसे महिला वोट एनडीए के लिए अंतिम जीत का मंत्र बन गया।
पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बाद चुनाव आयोग पर लगे वोट चोरी के आरोपों पर ज़ोर देकर चुनावी विमर्श को लगभग पूरी तरह से हाईजैक कर लिया था। राहुल गांधी ने इस अभियान की अगुवाई की और इसे एक केंद्रीय चुनावी मुद्दा बनाने के लिए पूरे बिहार में एक विशाल “मतदाता अधिकार यात्रा” निकाली। हालाँकि, ऐसा प्रतीत होता है कि एसआईआर का मुद्दा बिहार के मतदाताओं को पसंद नहीं आया, जिनकी तात्कालिक चिंताएँ चुनावी हेराफेरी के जटिल दावों से कोसों दूर हैं।
बिहार विधानसभा के नतीजों को एक महत्वपूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखना ज़रूरी है। 2023 में जेडीयू-आरजेडी गठबंधन सरकार में, बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर यादव ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया था कि हिंदू महाकाव्य रामचरितमानस “समाज में नफरत फैलाता है”। उन्होंने दावा किया कि कुछ श्लोक भेदभावपूर्ण हैं और जाति विभाजन को बढ़ावा देते हैं, और इस ग्रंथ की तुलना “पोटेशियम साइनाइड” से की। चंद्रशेखर यादव की टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिसने उन्हें तुरंत बर्खास्त करने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के लिए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। सत्तारूढ़ महागठबंधन के अन्य राजनीतिक सहयोगियों, जैसे जेडी(यू) और कांग्रेस ने भी उनकी टिप्पणियों की कड़ी आलोचना की और उनके बयानों से खुद को अलग कर लिया, उन्हें उनके निजी विचार बताया।
2023 में राजद ने अपने सांसद मनोज झा के ज़रिए ठाकुर का कुआँ जैसे मुद्दे उठाकर वोटों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश की थी। “ठाकुर का कुआँ” का मुद्दा कोई वास्तविक घटना नहीं थी जिसने सामाजिक समरसता स्थापित की हो, बल्कि मुंशी प्रेमचंद की 1932 की एक प्रसिद्ध लघुकथा का केंद्रीय संघर्ष था जिसने जाति-आधारित भेदभाव और सामाजिक अन्याय की गहराई को उजागर किया था। इस कहानी में अस्पृश्यता और बुनियादी मानवाधिकारों के हनन से उत्पन्न तीव्र सामाजिक वैमनस्य को उजागर किया गया था, जिसका उद्देश्य सामाजिक चेतना और सुधार को बढ़ावा देना था, न कि किसी समाधान का जश्न मनाना।
जंगलराज के मुद्दे के अलावा, ये दोनों मुद्दे भी मतदाताओं की स्मृति में थे और यह बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों में भी परिलक्षित हुआ। रामचरितमानस सामाजिक ऊँच-नीच पर भक्ति और मानवीय मूल्यों पर ज़ोर देकर भाईचारे को बढ़ावा देता है, और तुलसीदास ने संस्कृत के बजाय स्थानीय अवधी बोली में लिखकर इस संदेश को समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाया। यह महाकाव्य भगवान राम के समावेशी संवादों और एकता व न्याय के आदर्श समाज के रूप में “रामराज्य” के चित्रण के माध्यम से इसे दर्शाता है।
जिस ज़माने में ठाकुर का कुआँ सभी के लिए सुलभ नहीं रहा होगा उस ज़माने में जरुरत पड़ने पर ठाकुर ने देश की हिफाज़त के लिए अपना सर्वश्व न्योछावर किया। लेकिन आज समाज को एक ऐसे नए सामंतवाद से जूझना पड़ रहा है जो राजनीति में परिवारवाद का पोषक है और नए सामंती विचारधारा को आगे बढ़ा रही है साथ ही भ्रस्टाचार का उद्गम है। राजद जैसे क्षेत्रीय दल आम आदमी के संसाधन को खूब लुटे हैं जब वे सत्ता में आते है और सामंतवाद के नए प्रतीक के रूप में उभर कर सामने आये हैं । राजद के शासन में १९९० के दशक में अपहरण और भ्रस्टाचार सरकार द्वारा पोषित थे। क्या मनोज झा को ये सामंतवाद नहीं दिखाई पड़ता है ? क्या लालू के बाद राबड़ी देवी और राबड़ी के बाद तेजस्वी ही राजद के उत्तराधिकारी होंगे यह सामंतवाद नहीं है तो क्या है ?
नए राजनीतिक जनादेश में सरकार की चुनौतियों से निपटने के लिए औद्योगिक निवेश के लिए रणनीतिक प्रोत्साहन, निजी क्षेत्र के अवसरों का विस्तार और सरकारी रोजगार योजनाओं का समय पर क्रियान्वयन परिलक्षित होना चाहिए, जो इस पलायन को रोकने और राज्य के भीतर निरंतर आजीविका पैदा करने में महत्वपूर्ण होगा।

