आशीष कुमार सिंह

कल शाम कॉफ़ी हाउस में तीन यार बैठे थे।
पहला था “नेहरू का पोता” – पुराना कांग्रेसी।
दूसरा था “मोदी का चेला” – नया-नकोर भाजपाई।
और तीसरा था हमारा-आपका सच्चा दोस्त – नाम जनता भाई, जो हर बार बिल चुकाता है और फिर भी कोई पूछता तक नहीं।

चाय आई।
नेहरू का पोता हँसते हुए जनता भाई के कंधे पर ज़ोर से एक मुक्का जड़ दिया।
“यार 1952 में तो मज़ा आया था ना? पूरा का पूरा डिलीट कर दिया था!”

जनता भाई ने दर्द सहते हुए हँसकर टाल दिया, “अरे छोड़ो यार, पुरानी बातें…”

तभी मोदी का चेला खड़ा हुआ, जनता भाई के उसी कंधे पर और ज़ोर का मुक्का मारा और चिल्लाया,
“अरे हरामी! तूने मेरे दोस्त को मारा था ना? अब मेरी बारी!”

जनता भाई गिरते-गिरते बचा, आँखों में आँसू और मुँह से चाय निकलते हुए बोला,
“अरे भाई, तुम दोनों मुझे ही मार रहे हो! मैंने कब मारा किसी को?”

दोनों एक साथ हँस पड़े।
नेहरू का पोता बोला, “अरे यार, डेमोक्रेसी है… टर्न बाय टर्न चलता है!”
मोदी का चेला बोला, “हाँ, और टर्न हमेशा तेरा ही आएगा, क्योंकि तू ही बिल चुकाता है!”

जनता भाई ने आँसू पोंछते हुए बिल माँगा और धीरे से बोला,
“ठीक है भाइयो, आज फिर मैं ही चुकाता हूँ… लेकिन अगली बार मैं घर पर नहीं रहूँगा।”

दोनों ने एक साथ कहा,
“अरे चिंता मत कर, हम तो तेरा वोटर कार्ड ही काट देंगे… फिर तू घर पर रहेगा या कहीं और, हमें ढूँढ ही लेंगे!”

जनता भाई चुपके से वेटर को बोला,
“भाई, बिल इन दोनों के नाम कर दो… मैं तो वोटर लिस्ट से ही गायब हो जाऊँगा!”

बस यही सीन हर पाँच साल बाद लोकसभा में भी चलता है।
मारने वाले बदलते हैं, मार खाने वाला वही रहता है – जनता भाई।
और बिल भी वही चुकाता है।

अब असल कहानी लोकसभा की
राहुल गांधी चिल्ला रहे थे –
“ये SIR नहीं, सरकारी सिलेक्टिव इरेज़र है! लाखों गरीब, दलित, मुस्लिम, आदिवासी के नाम काटे जा रहे हैं!”

अमित शाह जी मुस्कुराते हुए खड़े हुए और बोले,
“अरे भाई, तुम्हारे परदादा नेहरू जी ने 1952, 1957, 1961 में तीन-तीन बार यही किया था। इंदिरा जी ने 1983-84 में, राजीव जी ने 1987-89 में, नरसिम्हा राव जी ने 1992 और 1995 में, मनमोहन जी ने 2004 में… हम तो बस उसी पुरानी परंपरा को निभा रहे हैं। तुमने मारा था, अब हम मार रहे हैं – डेमोक्रेसी में यही टर्न बाय टर्न चलता है ना!”

यानी सरकारें बदलती हैं, लेकिन सरकार का स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलता।
कांग्रेस ने क्या किया, क्यों किया – ये सब विवादित हो सकता है।
पर अमित शाह खुलेआम कह रहे हैं कि हम यह कर रहे हैं और आगे भी करेंगे, क्योंकि हमें लगता है कि पहले तुमने किया था।
गलती सुधारने की कोई बात नहीं, बस बहाना चाहिए – “पहले तुमने किया था, इसलिए अब हमारा हक बनता है।”

और सबसे मज़े की बात तो ये है कि चुनाव आयोग ने डुप्लीकेट वोटर पकड़ने वाला अपना खुद का सॉफ्टवेयर ही चुपचाप स्क्रैप कर दिया।
जो सॉफ्टवेयर सालों से डुप्लीकेट एंट्रीज़ को ऑटोमैटिक पकड़ता था, उसे पता नहीं किस रहस्यमयी कारण से बंद कर दिया गया और इस बार SIR में उसका इस्तेमाल ही नहीं किया गया।
यानी एक तरफ कह रहे हैं “हम तो बस डुप्लीकेट नाम हटा रहे हैं”,
दूसरी तरफ डुप्लीकेट पकड़ने वाली मशीन ही फेंक दी।
अब नाम काटने का काम मैनुअल हो गया है – मतलब जिसका मन करे, उसका नाम काट दो।
सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में कहा कि वो सॉफ्टवेयर तो काम का था ही नहीं, फिर भी उसे स्क्रैप करने का कोई जवाब नहीं दिया गया।
बस चुपचाप कबाड़ में डाल दिया।

फिर सरकार ने चुनाव आयोग को पूरा राम-बाण कवच पहना दिया है:

  • सीसीटीवी फुटेज 45 दिन बाद ऑटो-डिलीट – क्योंकि सबूत भी एक्सपायरी वाला दही है।
  • चुनाव आयुक्तों को एफआईआर से इम्यूनिटी – गड़बड़ी हो तो कुंडली पर केस।
  • मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट किसी पार्टी को नहीं – डेटा प्राइवेसी, भाई!
  • ईवीएम चेक करनी हो तो सिर्फ 5% मशीनें, सिर्फ प्लास्टर देखो, चाकू नहीं।
  • डुप्लीकेट चेक करने वाला सॉफ्टवेयर – स्क्रैप! अब मैनुअल काटो, जैसे मन आए।

नया फॉर्मूला बिल्कुल तैयार है:
पहले सॉफ्टवेयर फेंको → फिर मैनुअल काटो → सबूत मिटाओ → आयुक्तों को भगवान बना दो → चिल्लाओ “देखो, सब पारदर्शी है… बस दिखाई नहीं दे रहा!”

तो जनता भाई, अगली बार जब तुम्हारा नाम वोटर लिस्ट से गायब हो जाए,
तो कॉफ़ी हाउस मत जाना।
चुपचाप घर पर बैठकर चाय खुद बनाना,
और सोचना –
“यार, डेमोक्रेसी में दोस्ती कितनी महँगी पड़ती है…
और दोस्त भी ऐसे जो पहले मशीन फेंकते हैं, फिर पीठ पर हाथ से मुक्का मारते हैं,
फिर एक-दूसरे से गले मिलकर कहते हैं –
‘चिल यार, टर्न बाय टर्न चलता है… बस टर्न हमेशा तेरा ही!’”

मारने वाला बदल जाता है,
मार हमेशा एक ही को पड़ती है,
और बिल भी वही चुकाता है।
नाम है जनता भाई।
हम।
आप।
सब।

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