भारत की राजनीति में धार्मिक प्रतीकों का उपयोग हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। एक ओर जहां हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर राम मंदिर का निर्माण अयोध्या में चरमोत्कर्ष पर पहुंचा है, वहीं दूसरी ओर मोदी सरकार के कार्यकाल में सैकड़ों-हजारों मंदिरों की तोड़फोड़ ने हिंदू समुदाय में गहरी नाराजगी पैदा की है। क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाकई हिंदू हृदय सम्राट हैं, या उनकी सरकारें विकास और शहरीकरण के नाम पर प्राचीन धरोहरों को कुचल रही हैं? यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों, सरकारी आंकड़ों और समसामयिक घटनाओं के आधार पर इस सवाल की खोज करता है। हम देखेंगे कि कैसे मोदी के शासन में मंदिर तोड़फोड़ की घटनाएं औरंगजेब जैसे ऐतिहासिक शासकों से तुलना कराने लायक हो गई हैं, जैसा कि काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत ने कहा है।
ऐतिहासिक संदर्भ: औरंगजेब से मोदी तक की तुलना
औरंगजेब को भारतीय इतिहास में मंदिर तोड़ने के लिए बदनाम किया जाता है। 1669 में काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करने का आदेश देकर उन्होंने हिंदू भावनाओं को आहत किया था। लेकिन आधुनिक भारत में, जहां धर्मनिरपेक्षता संवैधानिक मूल्य है, मंदिर तोड़फोड़ का स्वरूप बदल गया है। यह अब अवैध अतिक्रमण हटाओ या शहरी विकास के नाम पर हो रही है।
काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत ने 2024 में एक साक्षात्कार में कहा, मोदी ने औरंगजेब से ज्यादा मंदिर तोड़े हैं। यह बयान काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट के संदर्भ में था, जहां मंदिर के आसपास के इलाकों में सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर और घरों को ध्वस्त किया गया। महंत के अनुसार, औरंगजेब ने विशिष्ट मंदिरों को निशाना बनाया, लेकिन मोदी सरकार के विकास मॉडल ने व्यापक स्तर पर धरोहरों को प्रभावित किया। यह तुलना अतिशयोक्ति लग सकती है, लेकिन आंकड़े इसे चुनौती देते हैं।
गुजरात में मोदी का विकास: 2008 का अतिक्रमण अभियान
मोदी के मुख्यमंत्री काल (2001-2014) में गुजरात सबसे पहले इसकी चपेट में आया। 2008 में, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, राज्य की राजधानी गांधीनगर में अवैध अतिक्रमण के खिलाफ अभियान चला। एक महीने में 80 मंदिरों या उनके हिस्सों को तोड़ दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, GH-5 सर्कल के आसपास के इलाकों में छह मंदिर रातोंरात गायब हो गए। विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने इसका विरोध किया और इसे महमूद गजनवी की तरह मंदिर लूट करार दिया।
VHP के दबाव में मोदी ने अभियान रोक दिया, लेकिन नुकसान हो चुका था। हिंदुस्तान टाइम्स ने रिपोर्ट किया कि एक हफ्ते में ही 200 मंदिर ध्वस्त हो चुके थे। यह घटना मोदी की हिंदुत्व छवि पर पहला सवालिया निशान लगाती है। क्या विकास के नाम पर धार्मिक स्थलों की बलि चढ़ाना उचित है?
केंद्र में मोदी: काशी, अयोध्या और देशव्यापी तोड़फोड़
प्रधानमंत्री बनने के बाद (2014 से अब तक), मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स चलाए, लेकिन इनके नाम पर मंदिरों की तोड़फोड़ बढ़ी।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर: धरोहर का सफाया
2021 में शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के लिए काशी में 300 से ज्यादा घर और छोटे मंदिर तोड़े गए। ASI (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) के बजट में कटौती के कारण प्राचीन अवशेषों का संरक्षण नहीं हो सका।
एक पुरातत्वविद् केके मुहम्मद ने कहा, BJP ने 2014 से एक भी मंदिर बहाल नहीं किया, उल्टा हजारों तोड़े। X पर यूजर्स ने साझा किया कि कॉरिडोर के लिए सड़कें चौड़ी करने में कई पौराणिक मंदिर मिटा दिए गए।
अयोध्या राम मंदिर: विडंबना की हद
राम मंदिर निर्माण के लिए 2.77 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई, जिसमें कई छोटे मंदिर तोड़े गए। 2024 में मंदिर उद्घाटन के समय मोदी ने इसे न्याय की जीत कहा, लेकिन आसपास के इलाकों में सैकड़ों संरचनाएं गायब हो चुकी थीं।
उत्तराखंड और अन्य राज्य: सिलसिला जारी
2025 में उत्तराखंड के उत्तरकाशी में 9 मंदिर तोड़े गए, जबकि एक मजार हटाई गई। X पर वीडियो वायरल हुआ, जिसमें लोग पूछ रहे थे, यह हिंदुत्व है?
मुजफ्फरपुर (बिहार) में रेलवे स्टेशन के बाहर दो हनुमान मंदिर तोड़े गए, लेकिन अंदर की मस्जिद बची रही।
नागपुर में BJP शासित नगर निगम ने मंदिर तोड़ने का अभियान चलाया।
एक अनुमान के मुताबिक, गुजरात में अकेले 26,000 मंदिरों को ध्वस्त करने का आदेश था। भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने 2024 में ट्वीट किया, मोदी के अधिकांश कार्य हिंदू मंदिरों के खिलाफ हैं।
विडंबनाएं: मंदिर तोड़ो, लेकिन राम मंदिर बनाओ
मोदी सरकार राम मंदिर को अपनी उपलब्धि बताती है, लेकिन समानांतर में मंदिर तोड़फोड़ जारी है। 2025 में दिल्ली के RSS कार्यालय के पास एक 1500 वर्ष पुराना गोरखनाथ शिव मंदिर तोड़ा गया। X पर यूजर्स ने इसे मोदी का हिंदू राष्ट्र करार दिया। एक ओर पाकिस्तान में मंदिर तोड़फोड़ पर कड़ा रुख अपनाती है सरकार, वहीं घर में प्राचीन मंदिरों को बुलडोजर चलाने में संकोच नहीं।
यह दोहरा चरित्र हिंदू समुदाय में असंतोष पैदा कर रहा है। स्वामी ने कहा, उत्तराखंड और पंढरपुर में मंदिर राज्य के अधीन ले लिए। रावण? विकास जरूरी है, लेकिन क्या यह धरोहरों की कीमत पर?
निष्कर्ष: हिंदुत्व की खोखली गूंज
मोदी युग में मंदिर तोड़फोड़ कोई संयोग नहीं, बल्कि नीतिगत प्राथमिकता का परिणाम है। जहां एक ओर राम मंदिर जैसे प्रोजेक्ट्स से वोट बैंक मजबूत होता है, वहीं छोटे मंदिरों की अनदेखी हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाती है। अगर मोदी सबसे अधिक मंदिर तोड़ने वाले शासक बन रहे हैं, तो यह हिंदुत्व की विडंबना है। हिंदू समुदाय को चाहिए कि विकास के नाम पर अपनी धरोहर न गंवाए। संरक्षण कानूनों को मजबूत करें, ASI के बजट को बढ़ाएं, और मंदिरों को राजनीतिक उपकरण न बनने दें। अन्यथा, इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
यह लेख तथ्यों पर आधारित है, लेकिन सवाल बाकी हैं: क्या यह नया भारत है, या पुरानी गुलामी का नया रूप?
