आशीष कुमार सिंह

जब जनता खुद सवालों की हत्या कर दे, तो वह विपक्ष से लड़ने की उम्मीद किस मुंह से करती है? एक कड़वा विश्लेषण पढ़ते हैं।

भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक अजीबोगरीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। पिछले एक दशक से सत्ता के पक्ष में खड़े, और खुद को समझदार मानने वाले समर्थक वर्ग के भीतर अब हताशा के सुर फूटने लगे हैं। व्यवस्था की नाकामी जब उनके निजी जीवन को प्रभावित करने लगी है, तो उनका गुस्सा सरकार पर फूटने के बजाय एक अजीब सवाल पर जाकर अटक जाता है—आखिर विपक्ष क्या कर रहा है? वो सड़कों पर आंदोलन क्यों नहीं करता? वो हर मामले को लेकर कोर्ट क्यों नहीं जाता?
यह सवाल सुनने में जितना मासूम लगता है, असल में यह उतना ही कपटपूर्ण है। यह उस समाज की बौद्धिक बेईमानी का प्रतीक है, जिसने पिछले दस वर्षों में विपक्ष को व्यवस्थित रूप से खत्म करने का जश्न मनाया है।

चरित्र हनन और विपक्ष का सुनियोजित खात्मा

सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि विपक्ष आज जिस स्थिति में है, वहां उसे पहुंचाया किसने है? एक सुनियोजित विमर्श (नैरेटिव) के तहत विपक्ष के नेताओं का चरित्र हनन किया गया। किसी को पप्पू घोषित किया गया, तो किसी को देशविरोधी। हद तो तब हो गई, जब भ्रष्टाचार के आरोपी नेताओं को—जिन्हें कल तक यही समर्थक पानी पी-पीकर कोसते थे—सत्ता पक्ष ने अपनी वाशिंग मशीन में धोकर गले लगा लिया।

आज जब विपक्ष को नैतिक और संख्यात्मक रूप से पंगु बना दिया गया है, तब संकट के समय उसी मरे हुए विपक्ष से संजीवनी की उम्मीद करना, क्या उस समर्थक वर्ग की अपनी नाकामी नहीं है?

जनता की प्राथमिकता: विकास या भावनात्मक उन्माद?

मान लेते हैं कि कल विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, गिरती शिक्षा व्यवस्था या टोल टैक्स की लूट पर कोई देशव्यापी आंदोलन छेड़ दे। यक्ष प्रश्न यह है कि क्या जनता उसका साथ देगी?

बीते वर्षों का अनुभव बताता है कि जैसे ही विपक्ष जनता के मुद्दों (महंगाई, रोजगार) को उठाता है, सत्ता पक्ष राष्ट्रवाद या धर्म का एक भावनात्मक कार्ड खेल देता है। जनता 500 रुपये का पेट्रोल और 1000 रुपये का सिलेंडर खरीदने को तैयार हो जाती है, बशर्ते उसे यह विश्वास दिलाया जाए कि इससे धर्म की रक्षा हो रही है। जिस लोकतंत्र में मतदाता अपनी जेब कटवाकर भी खुश हो, वहां विपक्ष किसके भरोसे लाठियां खाए? जब पीड़ित ही लुटेरे के साथ खड़ा हो, तो बचाने वाला क्या कर सकता है?

जवाबदेही का पतन: 2004-13 बनाम आज

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि विपक्ष को कोर्ट जाना चाहिए। जो लोग यह कहते हैं, उन्हें याद करना चाहिए कि 2004 से 2013 के बीच (यूपीए शासनकाल) सरकारें कोर्ट के डर से नहीं, बल्कि लोक-लाज के डर से काम करती थीं।

उस दौर में विपक्ष का दबाव और मीडिया के तीखे सवाल नटवर सिंह, शिवराज पाटिल, सुरेश कलमाड़ी और ए. राजा जैसे कद्दावर मंत्रियों के इस्तीफे का कारण बनते थे। वह नैतिक जिम्मेदारी का दौर था। आज, न्यू इंडिया में एक अघोषित नियम है—हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते। चाहे रेल हादसे हों, पेपर लीक हो या मणिपुर जैसी त्रासदी, मंत्रियों की कुर्सी सुरक्षित रहती है। ऐसा इसलिए संभव है क्योंकि सत्ता को पता है कि जनता की याददाश्त कमजोर है और उसे हेडलाइन मैनेजमेंट से संभाला जा सकता है।

बौद्धिक सुन्नता का दौर

समस्या विपक्ष में नहीं, उस बौद्धिक सुन्नता में है, जिसे सोशल मीडिया और आईटी सेल के जरिए समाज के नसों में घोला गया है। सुबह-सुबह मोबाइल पर आने वाले नफरती और डरावने संदेशों ने एक बड़ी आबादी को सोचने-समझने में अक्षम बना दिया है।
यह वर्ग एक ऐसे ज़ोंबी में तब्दील हो चुका है, जिसे अपने अधिकारों के हनन का अहसास ही नहीं है। वह विपक्ष का मजाक उड़ाते-उड़ाते यह भूल गया कि विपक्ष सरकार का दुश्मन नहीं, बल्कि जनता का सुरक्षा कवच होता है। उस कवच को तोड़कर आपने खुद को तानाशाही के सामने नंगा कर दिया है।

निष्कर्ष

अतः जो लोग आज पूछ रहे हैं कि विपक्ष कहां है?, उन्हें आईने में देखकर खुद से पूछना चाहिए कि एक नागरिक के तौर पर मैं कहां हूं?

अगले कई दशकों तक आप धर्म और जाति के नाम पर एकतरफा वोट देते रहिए, विपक्ष तो शायद इतिहास बन जाएगा, लेकिन जब सत्ता निरंकुश होकर आपके दरवाजे पर दस्तक देगी, तब आपके पास बचाने वाला कोई नहीं होगा। लोकतंत्र में विपक्ष का कमजोर होना, किसी पार्टी की हार नहीं, बल्कि उस देश के आम नागरिक की सबसे बड़ी हार है।

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