आशीष कुमार सिंह, ई-मेल: singh.ashishkumar@gmail.com (https://www.facebook.com/share/1BaA8QmZrH/) —

लोकतंत्र को बचाने के लिए ECI को “हम ही सही हैं” की अकड़ छोड़कर अंतिम हद तक पारदर्शिता अपनानी ही होगी

विपक्ष बार-बार यही कह रहा है कि ECI की मौजूदा मानसिकता “हम जो कर रहे हैं वही अंतिम सत्य है, हमें किसी को कुछ साबित करने की जरूरत नहीं” वाली हो गई है। यह ठीक वही अहंकार है जो हर संस्था को अंत में खत्म कर देता है। लोकतंत्र में कोई भी संस्था खुद को “अचूक” मानने” का हक नहीं रखती—खासकर चुनाव आयोग, जिसका पूरा अस्तित्व जनता के विश्वास पर टिका है।

जब तक ECI यह नहीं मानेगा कि उसकी credibility अब सवालों के घेरे में है, तब तक ये सारे अनुत्तरित सवाल और बढ़ते जाएंगे और देश सचमुच electoral autocracy की श्रेणी में चला जाएगा।

तर्कसंगत आधार पर क्यों जरूरी है “अंतिम हद तक पारदर्शिता”

  1. विश्वास का संकट अब “perception” नहीं, “reality” बन चुका है
    महाराष्ट्र में 77 लाख, बिहार में 40 लाख+, हरियाणा में 20 लाख+ वोटरों की डिलीशन के बाद भी ECI ने एक भी डिलीटेड वोटर का डेटाबेस सार्वजनिक नहीं किया। जब इतने बड़े पैमाने पर जनता का हिस्सा काटा जा रहा हो और आप “ट्रस्ट मी ब्रो” कह रहे हों, तो विश्वास टूटना स्वाभाविक है।
  2. “हम ही सही हैं” वाली सोच संस्थाओं को खोखला कर देती है
    CBI, ED, Income Tax, अब ECI—सभी में यही पैटर्न दिख रहा है। पहले “हम निष्पक्ष हैं” कहते हैं, फिर “हमें जवाब देने की जरूरत नहीं”, फिर “कोर्ट भी हमें नहीं पूछ सकता”। यह authoritarian संस्थानों का क्लासिक रास्ता है। ECI अभी तीसरे चरण में है। अगर अब भी नहीं चेता तो चौथा चरण शुरू हो जाएगा—जहाँ जनता उसे पूरी तरह खारिज कर देगी।
  3. पारदर्शिता का “अंतिम हद तक” मतलब क्या है (व्यावहारिक सूची) ECI को तुरंत ये काम करने चाहिए—बिना कोर्ट के आदेश के, अपनी मर्जी से:
  • मशीन-रीडेबल पूरा वोटर लिस्ट (बिना नाम-पते के भी) सार्वजनिक करें ताकि कोई भी स्वतंत्र विश्लेषण कर सके
  • हर विधानसभा क्षेत्र के लिए डिलीटेड + जोड़े गए वोटरों की एक्सेल शीट डालें (नाम-पते हटाकर भी चलेगा)
  • पोलिंग बूथों का CCTV फुटेज 90 दिनों तक ऑनलाइन रखें (महिलाओं वाले बूथ का केवल बाहर का फुटेज भी काफी है)
  • Form 17C की स्कैन्ड कॉपी हर बूथ की तुरंत अपलोड करें (जैसा 2019 तक होता था)
  • VVPAT की 100% काउंटिंग का पायलट कम से कम 5% सीटों पर करें
  • SIR के दौरान BLO द्वारा भरे गए हर Form 7, Form 8 की कॉपी संबंधित पार्टियों को उपलब्ध कराएं
  1. अगर ECI ये नहीं करता तो इसका मतलब साफ है
    वह अब “निर्वाचन आयोग” नहीं, “सत्ता संरक्षण आयोग” बन चुका है। और जब चुनाव आयोग ही सत्ता का संरक्षण करने लगे तो लोकतंत्र अपने अंतिम चरण में पहुँच जाता है—चुनाव होते हैं, पर परिणाम पहले से तय होते हैं।

संक्षेप में:
ECI को यह समझना होगा कि उसकी legitimacy अब उसके अपने दावों से नहीं, जनता की नजर में बची हुई थोड़ी-सी विश्वसनीयता से चल रही है। “हम ही सही हैं” वाली मानसिकता छोड़कर अगर वह स्वेच्छा से “अंतिम हद तक पारदर्शिता” अपनाता है तो अभी भी लोकतंत्र बच सकता है।

नहीं तो इतिहास उसे “उस आयोग” के रूप में याद रखेगा जिसने भारत को electoral autocracy में पहुँचाया।
और यह जिम्मेदारी सिर्फ़ ECI की नहीं, बल्कि उन सभी की है जो आज चुप हैं।

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