5 दिसंबर 1994 हंगरी के बुडापेस्ट में युक्रेन की बर्बादी के समझौता पर यूक्रेन के राष्ट्रपति के साथ रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने हस्ताक्षर किए थे। रूस, अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया की कई शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि वहां मौजूद थे। समझौता का शर्त था कि यूक्रेन अपने परमाणु हथियार का बड़ा जखिरा नष्ट कर दे या रूस को दे दे। इसको बुडापेस्ट मेमोरंडम ऑन सिक्योरिटी अश्योरेंस का नाम दिया गया। बदले में अमेरिका-यूरोप-रुस ने यूक्रेन को सुरक्षा की गांरटी दी थी।

युक्रेन-रुस युद्ध ने स्वतंत्र देशों को कई सबक दिए हैं। एक व्यक्ति की आत्मनिर्भरता की तरह ही एक राष्ट्र के लिए भी आत्मनिर्भरता अनिवार्य है। आज यूक्रेन इसका ताजातरीन उदाहरण है कि कैसे यूरोप और अमेरिका के भरोसे अपने अस्तित्व को ही युद्ध की विनाशक अग्नि में झोंक दिया। इसके पीछे की कहानी का एक पहलू यह भी है कि एक पूर्व समझौते में रुस भी यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी दिया था।

रूस का एक प्रस्ताव था कि वारसा पैक्ट के साथ ही नाटो को भी खत्म कर देना चाहिए था। क्योंकि जिसके खिलाफ नाटो का गठन हुआ था, जब वही नहीं रहा तो नाटो की जरुरत स्वत: ही समाप्त होनी चाहिए थी लेकिन हुआ उल्टा। नाटो के विस्तार की भूख ने यूक्रेन को युद्ध की आग में झोंक दिया। हालात ऐसे बने कि यदि नाटो इस युद्ध का हिस्सा बना तो तिसरा विश्व युद्ध् को परमाणु युद्ध में धसने का खतरा है। और, ऐसा हुआ तो पूरी दुनिया बर्बाद हो जाएगी।

यह युद्ध पूरी दुनिया में मंहगाई लायेगा और दुनियाभर के आमलोग महंगाई की मार से कराह उठेंगे। रुस-यूक्रेन युद्ध केवल सामरिक शक्ति या क्षेत्रीय आधिपत्य की उपज नहीं है यह रूस के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक आत्मनिर्भरता से जुड़ा मुद्दा भी है और इसे नाटो और पश्चिमी देशों ने खेल दिया। अमेरिका की अगुवाई में पश्चिम के देश यूक्रेन में कठपुतली सरकार चाहते हैं। जैसा कि उन्होंने सीरिया, इराक, लीबिया, लेबनान और वेनेजुएला में किया है। फिलहाल, यूक्रेन बर्बाद हो रहा है और बाकी के देश इसमें अपना-अपना फायदा तलाश रहें हैं।

थोड़ा इसे इतिहास में जाकर समझते हैं। इस युक्रेन-रुस युद्ध का बीज अमेरिका और ब्रिटेन ने बोया था। अमेरिका और ब्रिटेन ने साजिश रची और यूक्रेन की राजधानी कीव में तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच के विरोध में प्रदर्शन शुरू हुआ और इतना उग्र था कि वर्ष 2014 के फरबरी महीने में यानुकोविच को देश छोड़ कर भागना पड़ा और यूक्रेन में अमेरिका-यूरोप की कठपुतली सरकार बन गई, यही वह टर्निंग प्वाइंट है। इसके बाद रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर लिया और वहां के अलगाववादियों को समर्थन देना शुरू कर दिया और रूस समर्थक अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े भूभाग पर कब्जा करके आग में घी डाल दिया। इसका असर यह हुआ कि वर्ष 2014 के बाद यूक्रेन के डोनबास में रूस समर्थक अलगाववादी और यूक्रेन की सेना के बीच संघर्ष होने लगा। फ्रांस और जर्मनी के हस्तक्षेप से वर्ष 2015 में बेलारूस की राजधानी मिनिस्क में दोनों के बीच संघर्ष विराम हो गया। किंतु, एक दूसरे को यह पहुंचाया गया चोट और षडयंत्र की आग सुलगता रही।

5 दिसंबर 1994 हंगरी के बुडापेस्ट में युक्रेन की बर्बादी के समझौता पर यूक्रेन के राष्ट्रपति के साथ रूसी राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन और अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने हस्ताक्षर किए थे। रूस, अमेरिका और ब्रिटेन समेत दुनिया की कई शक्तिशाली देशों के प्रतिनिधि वहां मौजूद थे। समझौता का शर्त था कि यूक्रेन अपने परमाणु हथियार का बड़ा जखिरा नष्ट कर दे या रूस को दे दे। इसको बुडापेस्ट मेमोरंडम ऑन सिक्योरिटी अश्योरेंस का नाम दिया गया। बदले में अमेरिका-यूरोप-रुस ने यूक्रेन को सुरक्षा की गांरटी दी। युक्रेन के राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच रूस समर्थक माने जाते थे।

इस बुडापेस्ट मेमोरंडम ऑन सिक्योरिटी अश्योरेंस के तहत NonProliferation of Nuclear Weapons (NPT) समझौता पर दस्तखत कर यूक्रेन ने खुद को Non-Nuclear-Weapons State घोषित कर दिया और अपने सभी 5000 परमाणु हथियार रूस के बोरिस येल्तसिन और अमेरिका को सौंप दिए। बदले में यूक्रेन को रूस से इस बात की लिखित गारंटी मिली कि यूक्रेन की सुरक्षा की जिम्मेदारी रूस की है। किसी भी बाहरी आक्रमण पर रूस यूक्रेन की रक्षा करेगा।

इसके बदले में अमेरिका ने रूस को गारंटी दी कि वो नाटो का विस्तार पूर्वी यूरोप में नहीं करेगा। लेकिन इस समझौते पर न रूस कायम रहा और न अमेरिका। लेकिन, अपने परमाणु बमों का समर्पण कर आज यूक्रेन बली का बकरा बन कर बर्बाद हो गया।

यह बिडम्बना देखिए कि सुरक्षा का भरोसा देने वालों में से एक रूस आज यूक्रेन पर हमला कर रहा है और मदद का भरोसा देने वाला अमेरिका समेत दूसरे अन्य देश आर्थिक प्रतिबंध की धमकी दे रहे हैं और पूरे यूक्रेन के प्राकृतिक संसाधनों को अपने कब्जे में लेना चाहता है।

यूक्रेन बर्बाद हो रहा है। यूक्रेन का आधुनिक इन्फ्रास्ट्क्चर मलबा बन रहा है, लोग लाशों की ढ़ेर में तब्दील हो रहे हैं, डर से घर-बार छोड़ कर पलायन कर रहें हैं। यह सब सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि यूक्रेन ने अमेरिका-यूरोप-रुस की बात मान ली। यदि आज यूक्रेन के पास परमाणु हथियार होता तो उसकी ऐसी दुर्दशा नहीं होती। दरअसल, यह अन्तर्राष्ट्रीय समझौते का एक काला सच है।

भारत के साथ भी इसी तरह के दबाव की एक घटना हुई थी जब अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे। वर्ष 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद अमेरिका समेत समूचे विश्व के साथ-साथ इस देश की सरकार में शामिल वामपंथियों ने भी अटल जी पर NPT पर हस्ताक्षर करने का ख़ूब दबाव डाला। किंतु अटल जी ने भारत की अपनी शक्ती को प्राथमिकता दी।

युक्रेन के मामले में न तो अमेरिका की गलती है और न रूस की। यह गलती यूक्रेन के जनता की है जिसने एक कमेडियन ज़ेलेन्स्की को देश का राष्ट्रपति बनाया। विक्टर यानुकोविच से रूस के बहुत अच्छे संबंध थे। जेलेंस्की को नाटो का सदस्य बनना था लेकिन बन गया अमेरिका का कठपुतली और पूरे यूक्रेन को बर्बाद कर दिया।

अब रूस और अमेरिका ने सऊदी अरब में यूक्रेन की अनुपस्थिति में यूक्रेन पर कुछ गुप्त समझौता किये हैं। अभी जेलेंस्की से अमेरिका दुर्लभ खनिज संपदा के दोहन का अधिकार ले रहा है। रूस भी अपने कब्जे वाले यूक्रेन के खनिज अमेरिका को देगा। अमेरिका और रूस खुश और यूक्रेन बर्बाद !

हम सबने देखा कि व्हाइट हाउस बैठक में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और जेलेंस्की में बहस का स्तर इस कदर बिगड़ गया कि यूक्रेनी राष्ट्रपति कहने लगा कि आप मुझे बोलने का मौका नहीं दे रहे। वहीं ट्रंप ने मीडिया के सामने कहा कि हमने 550 अरब डॉलर यूक्रेन को दिया, आप मूर्ख राष्ट्रपति हैं, आपको समझौता करना ही होगा।

अमेरिका की हथियार लॉबी डीप स्टेट जेलेंसकी को नचाती रही और उन्होंने ही जेलेंसकी को यह संदेश दिया था कि आपको एक ऐसा व्यक्ति दिखना है जिसके पास कपड़े बदलने के लिये टाइम नहीं है, जिसने अच्छे कपड़े पहनना छोड़ दिया है, जो सिर्फ अपने देश के लिए सोच रहा है। जबकि इसी समय वोग जैसी 20 से ज्यादा मशहूर मैगजीन के लिए जेलेंसकी और उनकी पत्नी ने शानदार कपड़ों में फोटो शूट भी करवाए। ठीक यही साजिश अमेरिका का डीप स्टेट भारत में भी कर रही है।

भारत में डीप स्टेट ने नया दांव अरविंद केजरीवाल पर खेला था। उन्हें लगा कि यह लंबी रेस का घोड़ा है और केजरीवाल को डीप स्टेट जो जो सिखाती थी वह करता था, जैसे की हमेशा चप्पलों में रहो, शर्ट कभी पैंट के अंदर मत करो और अपनी साइज से लंबी शर्ट पहनो, शर्ट कभी प्रेस मत करो, खूब सिकुड़न हो, शर्ट के बटन उपर नीचे हों ताकि लगे कि तुम बहुत व्यस्त रहते हो, तुम्हें अपने लिए समय ही नहीं है। तुमने अपना पूरा समय जनता के लिए दे दिया है। जेब में ₹5 की पेन लगाओ ताकि लगे कि तुम एक बड़े आम आदमी हो, लेकिन तुम्हारे पास शर्ट खरीदने के भी पैसे नहीं है। तुम किसी ठेले से ओवर साइज शर्ट खरीदते हो। यहां तक की मुख्यमंत्री बनने के बाद हर साल गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस परेड में भी अरविंद केजरीवाल सैंडल और चप्पल में जाता था। और इसमें केजरीवाल ने जब राष्ट्रपति भवन में फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति ओलांद आए थे और उनके सम्मान में डिनर था, तब भी यह हवाई चप्पल में पहुंचे थे। खालिस्तानियों से तालमेल बिठाया और पंजाब के किसान आंदोलन को केन्द्र के खिलाफ खड़ा किया। अब पंजाब में किसान आंदोलन की पिटाई कर रहा है, आम आदमी पार्टी की दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी मारलेना अब इसी किसान आंदोलन को विकास में बाधक बता रही है।

बाद में जब डीप स्टेट को लगा कि अरविंद केजरीवाल तो सत्ता में आने के बाद ‘क्रांति की राह’ पर जा रहा है तब डीप स्टेट ने फंडिंग करना बंद कर दिया। फिर इस फंडिंग की कमी को पूरा करने के लिए ही अरविंद केजरीवाल दिल्ली शराब घोटाला करने पर मजबूर हुए।

अभी भी डीप स्टेट की फंडिंग भारत के कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दूसरी विभाजनकारी पार्टियों, विचारों और पहचानवादी समूहों-समुदायों को होती है। राहुल गांधी और जेलेंसकी के क्रियाकलापों को गौर से देखने पर ऐसा लगता है कि पूरा स्क्रिप्ट जॉर्ज सोरेस के ऑफिस से आता है और इस स्क्रिप्ट का पालन राहुल गांधी कर रहे हैं। कड़ाके की सर्दी में टी शर्ट में भारत जोड़ो पदयात्रा करते हैं, कभी कहते हैं- मैं राहुल गांधी नहीं हूं, कभी मैं तपस्वी हूं, कभी कुछ, कभी कुछ उल जलूल हरकतें करते घूमते हैं। किन्तु अब लगता है कि डीप स्टेट राहुल गांधी की असफलता से भी आजिज आ चुका है। अब डीप स्टेट किसी नए एजेंट पर फंडिंग की तैयारी में है। जो हमेशा अपने देश के मुद्दे को उनके मुताबिक तय करे और इससे वह कभी भी अपने देश का भला नहीं कर सकता।

डीप स्टेट का असर देखें कि भारत के ngo और क्षेत्रीय पार्टियां विभाजन की राजनीति ही करते हैं। ये भाषा से लेकर राष्ट्र विभाजन तक के मुद्दे पर राज्यों में ओवर या अन्डरग्राउन्ड कार्य करते हैं। यह तालमेल गजब का है जो सतह पर आ गया है, दिखने लगा है। पश्चिम बंगाल की TMC ममता बनर्जी, दक्षिण राज्यों में, उत्तर-पूर्व राज्यों में मजबूत किये जाते अलगाववादी संघर्ष की गहराई तब पता चलता है जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय JNU का पढ़ा शरजील इमाम असम को बाकि भारत से काट देने की बात करता है। और, अरुणाचल प्रदेश में एक ईसाई पुजारी इस राज्य के एक हिस्से को प्रभु इशु का मुक्त देश यानि इसाई शासन वाला देश घोषित करता है।

झारखंड में आदिवासियों के बीच कार्यरत कथित सामाजिक कार्यकर्ता Social Activist अपने फेसबुक पर झारखंड को युक्रेन के साथ रखते हुए कहना चाहता है कि यह राज्य भारत का युक्रेन बन जाए। जैसे यूरोप का युक्रेन! इससे पता चलता है कि डीप स्टेट भारत में किस स्तर से छोटे से छोटे आंदोलनों को फंडिंग करता है, ऐसे कई लोग हैं और पूरी की पूरी NGO भी है।

अरुण प्रधान

  • Arun Pradhan

    Arun Pradhan (Founder Editor-newspcm) is a social activist with editor, writer, translator in Hindi literature and journalism.

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