
JNU-VC-Prof.-Shantishri-Dhulipudi-Pandit
नई दिल्ली, 24 अगस्त 2022: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित ने दिल्ली में केंद्रीय सामाजिक न्याय और सशक्तीकरण मंत्रालय की ओर से 23 अगस्त को आयोजित बीआर आंबेडकर लेक्चर सिरीज़ के ‘जेंडर जस्टिस पर डॉ बीआर आंबेडकर के विचारः समान नागरिक संहिता की व्याख्या‘ विषय पर ब्याख्यान में कहा कि “जेंडर जस्टिस के प्रति सबसे बड़ा सम्मान यह होगा कि हम बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की महत्वाकांक्षा के अनुरूप समान नागरिक संहिता को लागू करें।”
अपने ब्याख्यान में JNU vc प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित ने कहा कि जब गोवा में यह क़ानून सभी धर्मो के लिए लागू हो सकता है जिसे पुर्तगालियों ने लागू किया था, तो बाक़ी देश में इसे क्यों नहीं लागू किया जा सकता ? गोवा में समान नागरिक संहिता है जो पुर्तगालियों द्वारा लागू की गई थी, इसलिए वहां हिंदू, ईसाई और बौद्ध सभी ने इसे स्वीकार किया है, तो ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा।”
उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता कि “देश में अल्पसंख्यकों को सारे अधिकार दे दिए जाएं लेकिन बहुसंख्यकों को वे सभी अधिकार न मिलें। अगर ऐसा होता रहा तो एक दिन यह चीज़ आपको इतनी उल्टी पड़ जाएगी कि इसे संभालना मुश्किल हो जाएगा।”
प्रो0 पंडित ने कहा कि “आंबेडकर पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना चाहते थे क्योंकि बिना सामाजिक लोकतंत्र के राजनीतिक लोकतंत्र का लक्ष्य मृगतृष्णा ही रहेगा। उन्होंने कहा कि क़ानूनों की एकरूपता लोगों को प्रगतिशील और उनकी सोच को बड़ा बनाने के लिए ज़रूरी है।”
“हमारे यहां आधुनिक भारत का कोई भी नेता उनके जितना महान विचारक नहीं था। गौतम बुद्ध के बारे में उन्होंने कहा है कि वे हमारे समाज में मौजूद ढांचागत भेदभाव को लेकर जगाने वाले शुरुआती लोगों में से एक थे।”
”मैं सभी महिलाओं को बता दूं कि मनुस्मृति के अनुसार सभी महिलाएं शूद्र हैं। इसलिए कोई भी महिला ये दावा नहीं कर सकतीं कि वे ब्राह्मण या कुछ और हैं। आपको जाति केवल पिता या विवाह के ज़रिए पति से मिलती है। मुझे लगता है कि ये पीछे ले जाने वाला विचार है।”
महिलाओं के लिए आरक्षण की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए उन्होंने कहा कि “अधिकतर लोग इसके पक्ष में होंगे। आज भी देश के 54 विश्वविद्यालयों मे से केवल 6 में महिला कुलपति हैं।”
अपने ब्याख्यान में हिन्दू देवी-देवता पर बोलते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित ने प्राचीन भारत का जिक्र करते हुए उस समय जातिय-सामाजिक संरचना की भी कल्पना कर कहा कि ”आप में से अधिकांश को हमारे देवताओं की उत्पत्ति को मानवशास्त्र या वैज्ञानिक लिहाज से समझना चाहिए। कोई भी देवता ब्राह्मण नहीं हैं। सबसे ऊंचा क्षत्रिय है। भगवान शिव एससी या एसटी समुदाय के होंगे, क्योंकि वे श्मशान में गले में सांप डालकर बैठते हैं। उनके पास पहनने के लिए कपड़े भी बहुत कम हैं. मुझे नहीं लगता कि ब्राह्मण श्मशान में बैठ सकते हैं।”
”लक्ष्मी, शक्ति या यहां तक कि भगवान जगन्नाथ भी मानवविज्ञान के लिहाज से अगड़ी जाति के नहीं हैं। भगवान जगन्नाथ आदिवासी समुदाय के हैं।”
जेंडर तटस्थता पर ज़ोर देते हुए जेएनयू की वीसी ने कहा है कि विश्वविद्यालयों के ‘कुलपति’ के लिए ‘कुलगुरु’ शब्द का इस्तेमाल होना चाहिए।
उन्होंने कहा, ”14 सितंबर को वर्किंग काउंसिल की बैठक में जब इस पर चर्चा होगी, तो मैं कुलपति को कुलगुरु करने का प्रस्ताव रखूंगी।” (चित्र साभार BBC)